वरदान माँगूँगा नहीं...
यह हार एक विराम है,
जीवन महा-संग्राम है ।
तिल-तिल मिटूँगा मैं पर...
दया की भीख लूँगा नहीं ।।
वरदान माँगूँगा नहीं...
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए,
अपने खण्डहरों के लिए ।
यह जान लो मैं विश्व की
सम्पत्ति चाहूँगा नहीं ।।
वरदान माँगूँगा नहीं...
क्या हार में क्या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत मैं ।
कर्तव्य पथ पर जो मिले...
यह भी सही वह भी सही ।।
वरदान माँगूँगा नहीं...
लघुता न अब मेरी छुओ,
तुम हो महान बने रहो ।
अपने हृदय की वेदना,
मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं ।।
वरदान माँगूँगा नहीं...
चाहे हृदय को ताप दो,
चाहे मुझे अभिश्राप दो ।
अब कुछ भी करो किन्तु,
कर्तव्य पथ से भागूँगा नहीं ।।
वरदान माँगूँगा नहीं...
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